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आजादी के जश्‍न शामिल नहीं हुए थे मोहनदास करमचंद गांधी, देखें तस्वीरें

भारत 15 अगस्त को आज़ाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था। रवींद्रनाथ टैगोर के जन-गण-मन को 1950 में राष्‍ट्रगान बनाया गया। हालांकि टैगोर इसे 1911 में ही लिख चुके थे।



देश की आजादी की लड़ाई में सबसे बड़ा योगदान मोहनदास करमचंद गांधी का था। लेकिन कम ही लोगों को यह बात मालूम है कि जब देश को आजाद घोषित किया गया, उस समय मोहनदास करमचंद गांधी देश की राजधानी दिल्ली में नहीं थे।



मोहनदास करमचंद गांधी 15 अगस्‍त 1947 को बंगाल के नोआखली में थे। वहां पर वे हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे।



नेहरू और पटेल ने गांधी को पत्र लिखकर भेजकर बताया था कि 15 अगस्त को देश का पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। लेकिन इसके बाद भी गांधी दिल्ली नहीं आए थे।



गांधी जी ने अपने लेटर के जरिए बताया था कि जब देश में हिंदु-मुस्लिम एक-दूसरे को मार रहे हैं, तो ऐसे में मैं खत के जरिए कहा था, जब हिंदु-मुस्लिम एक-दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं'।



नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टनी' दिया था। ये भाषण उन्‍होंने 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लॉज यानी आज का राष्ट्रपति भवन, से दिया था।



हर स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री, लाल किले से झंडा फहराते हैं। पर 15 अगस्त 1947 को ऐसा नहीं हुआ था। लोकसभा सचिवालय के एक शोध पत्र के अनुसार, नेहरू ने 16 अगस्त 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था।

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