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पद्मश्री मृणाल पांडे का सफर : वरिष्ठ पत्रकार से ट्विटर ट्रोल तक


मृणाल पांडेय हिंदी साहित्य की मशहूर साहित्यकार "शिवानी" जी की पुत्री हैं। ये मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड में जन्मी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा दीक्षा ली इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का वो जाना माना चेहरा हैं, जिनको कल सुबह दस बज कर आठ मिनट तक इज़्ज़त की नज़रो से देखा जाता था।

ब्राह्मण कुल में जन्मी मृणाल पांडेय को जिसने भी नब्बे के दशक में दूरदर्शन और स्टार न्यूज़ पर देखा हो या हिंदुस्तान अखबार में पढ़ा वो उन्हें बहुत ही उच्च कोटि की पत्रकार मानता रहा हैं, भारतीय पत्रकारिता में कम ही लोग है जिनकी हिंदी साहित्य में इतनी जबरदस्त पकड़ रही हो जितनी मृणाल पांडेय की है। आज जहाँ न्यूज़ चैनेल पर डिबेट के नाम पर मछली बाजार लगता है वहां मृणाल पांडेय एक समय बहुत सहजता शालीनता और शांति से डिबेट करवा दिया करती थी।
कल सुबह दस बजे उन्होंने ये ट्वीट किया जिसके पश्चात उनकी कमाई सारी इज़्ज़त दो मिनट में मिट्टी में मिल गयी।

देश में लोकतंत्र है ,अभिव्यक्ति की स्वतंन्त्रता है आपका प्रधान मंत्री और उनके समर्थको से वैचारिक विरोध हो सकता हैं, पर विरोधियों के लिए सार्वजनिक मंच पर ऐसी भाषा का चयन वो भी जन्मदिन पर, और वो भी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो एक एक शब्द चुन चुन के बोलता था!!

मृणाल पांडेय प्रसार भारती की अध्यक्ष हुआ करती थी, मई 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और उसके पश्चात उन्हें प्रसार भारती के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, आप बोल सकते है कि दक्षिण पंथी विचारधारा का विरोधी होने के चलते हटाया गया हो पर सच्चाई क्या रही होगी ये ट्वीट पढ़ के समझ सकते है।

जिस मीडिया का यह दायित्व होता है कि वो समाज और सरकार में व्याप्त भष्ट्राचार के खिलाफ देश में माहौल तैयार करेगा वो स्वयं अपने संस्थान में हो रहे भष्ट्राचार के खिलाफ हाथ खड़ी कर रही है, यह इनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को पर गम्भीर सवालिया निशान हैं ऐसे बेईमान और नकारा लोग प्रसार भारती छोड़िये किसी भी संस्थान में दीमक का काम करेंगे, आप स्वयं सोचिये की ऐसे इंसान के हाथ मे प्रसार भारती की बागडोर देना उचित था?

ऐसा नहीं है कि प्रधान मंत्री के खिलाफ उन्होंने पहली बार ऐसा कहा हो, इससे पहले उन्होंने मोदी जी की माता जी को लेकर यह टिप्पणी की थी।
यहाँ ये बताना जरूरी है कि मृणाल पांडेय "वामन" नामक महिलाओ की पत्रिका की संपादक भी रही है और राष्टीय महिला आयोग में काम भी किया है। यह इनके डबल स्टैण्डर्ड का दूसरा सबूत है!!
यह इनके नफरत का तीसरा कारनामा हैं, बलात्कार जैसे गंभीर अपराध और महिला सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे को पत्रकार महोदया शब्दों के मायाजाल में उलझा कर उलटा प्रधान मंत्री को निशाना बना रही हैं, जबकि तब राज्य में सरकार समाजवादी पार्टी की हुआ करती थी।

प्रधान मंत्री को लेकर मृणाल पांडेय के आपत्तिजनक ट्वीट के बाद जब उन्ही के सहपत्रकारो ने शालीन भाषा में आपत्ति दर्ज कराई तो उन्होंने जवाब देना जरूरी नहीं समझा उल्टा अपने ही सहकर्मियों को ब्लॉक कर दिया, इनके लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी सिर्फ वहां तक सीमित है जहाँ तक लोग इनके विचारों से सहमत हो। यह हाल हैं इन पत्रकार का जो बहुत बढ़ चढ़ के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा उठाये घुमते है ,पर उनके इस बात में कितना खोखलापन है ये आगे देखिये।
अजित अंजुम जी ने फेसबुक पोस्ट के जरिये जब इनकी भाषा पर सवाल उठाया तो मृणाल पांडे ने कोई सफाई देने के बजाय उन्हें ब्लॉक करना ही उचित समझा।
आलोक श्रीवास्तव जो कि पेशे से पत्रकार हैं, दैनिक भास्कर इंडिया टीवी और आज तक जैसे संस्थानो में कार्य कर चुके हैं उन्होंने लिखा-

तो मृणाल पांडेय ने उन्हें भी ब्लॉक कर दिया, थोड़ी सी भी खुद की आलोचना बर्दाश्त ना कर पाने वाले जब "अभिव्यक्ति की आजादी" के नाम का झंडा लेकर छाती पीटते हैं तो इन्हें देखकर बड़ी विद्रूपता होती हैं। मैं तो यही सोच के हैरान हूँ की पता नहीं इतना दोगलापन ये लोग लाते कहाँ से हैं?

मुझे तो यह सोच कर हँसी आ रही हैं कि 71 वर्ष की आयु में 3.5 करोड़ मोदी समर्थकों को ब्लॉक करने बैठेंगी तो कब उम्र बीत गयी पता ही नहीं चलेगा इससे अच्छा विकल्प हैं कि अपना अकाउंट ही डिलीट कर दें। ( यह व्यंग के तौर पर ले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हमे पूर्ण विश्वास हैं)

असल में ये पूरा eco सिस्टम है जो सालो से खड़ा किया गया हैं, इनकी नींव में वामपंथ की गहरी जड़ें है अब जबकि दक्षिणपंथी पार्टी की देश में सरकार है तो इनकी झटपटाहट कभी अवार्ड वापसी असहिष्णुता से निकलती है कभी ऐसे निम्न स्तर के ट्वीट से ... खैर जो भी हो सोचिये अगर सोशल मीडिया नहीं होता तो क्या इन पत्रकारो का असली चेहरा हमारे सामने आ पाता?

इनकी साहित्यिक हिंदी के पीछे छुपी नफरत और दुर्भावना कभी सार्वजनिक हो पाती? सोशल मीडिया में ट्विटर यूजर मृणाल पांडे की अभद्र टिप्पणी पर इनकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं-


सोशल मीडिया पर अपने ही सहयोगी पत्रकारों के साथ आम जनता के कड़े विरोध के बावजूद इन्हें अपनी गलती का एहसास नही हैं बल्कि पूरी बेशर्मी के साथ मृणाल पाण्डे यह कहकर अपना बचाव कर रही हैं कि "संस्कृत में 'वैशाखनंदन' को देवानांप्रिय भी कहते हैं, जिसका अर्थ होता है कि हर हाल में खुश रहने वाला, इसलिए उन्होंने वैशाखनंदन शब्द का प्रयोग किया"।
आपको हैरानी होगी यह जानकर की ऐसी नफरत रखने वाली पत्रकार को वर्ष 2006 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका हैं... खैर एक व्यक्ति एक विचारधारा से इनकी कितनी घृणा है ये हर दिन देखने मिल रही हैं, सोशल मीडिया में एक्टिव रहिए और हमारे साथ इनके भंडाफोड़ में आहुति देते रहिए।

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