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पश्चिम बंगाल : भाजपा हार कर भी लगातार जीत रही है, आखिर कहां व कैसे.

कोलकाता : बजट के दिन तीन लोकसभा और दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव का परिणाम भी आया और भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली. मीडिया में बजट के बाद राजस्थान की तीनों सीटें को कवरेज मिली, जिसे भाजपा ने गंवा दिया. पश्चिम बंगाल की दोनों सीटों को वह कवरेज नहीं मिला जो राजस्थान को मिला. हकीकत तो यह है कि भाजपा को यहां भी जीत नहीं मिली लेकिन यह सीटें भी इनकी नहीं थीं. कामयाबी तो जरूर मिली, भाजपा दोनों ही सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान भी जिस बात ने खींचा वो यह है बीजेपी के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी.

उलुबेड़िया में जहां 2014 के चुनावों में उसका वोट 11.5 फ़ीसदी था वो अब 23.29 फ़ीसदी हो गया है. वैसे ही नोआपाड़ा में भी वोट प्रतिशत में इजाफा देखने को मिला. दूसरी तरफ़ दो मुख्य विपक्षी पार्टियों लेफ़्ट फ़्रंट और कांग्रेस के वोट प्रतिशत में काफ़ी गिरावट आई है. ऐसा नहीं है कि पहली बार भाजपा ने राज्य के चुनावों में दूसरा स्थान हासिल किया है. दिलचस्प यह है कि पार्टी ने तेज़ी से कुछ सालों में अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाया है. पिछले साल हुए कांथी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा 30 फ़ीसदी वोट प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही. अगस्त’17 में भी निकाय चुनावों में उसने इसी स्थान को सुरक्षित रखा. 21 दिसंबर’17 को हुए सबंग विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी की अंतरा भट्टाचार्य को 37476 मत मिला था जबकि पिछले विधानसभा चुनाव 2016 में बीजेपी के काशीनाथ बसु को 5610 मत मिला था. यानी डेढ़ साल में ही 31866 मत ज्यादा. ऐसे में निश्चित तौर कहा जा सकता है कि भाजपा हार कर भी लगातार जीत रही है

बढ़ता ग्राफ के पीछे का रहस्य 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा का वोट शेयर बढ़ना एक ट्रेंड बन चुका है. वह अब दूसरा स्थान बनाने में सक्षम हो गए हैं. हालांकि, उनके और पहले स्थान में काफ़ी अंतर रहता है. भाजपा के वोट प्रतिशत में इस वृद्धि की वजह टीएमसी विरोधी वोटों का भाजपा के पक्ष में जाना भी है. इससे पहले टीएमसी विरोधी वोट लेफ़्ट या कांग्रेस के खाते में जाते थे. धीरे-धीरे सही लेकिन अब यह बदल रहा है. लेफ़्ट और कांग्रेस के कम हुए वोट प्रतिशत को देखा जाये तो भाजपा का उतना ही वोट प्रतिशत बढ़ा मिलेगा. इसका मतलब साफ़ है कि मूल रूप से भाजपा स्थापित दो राजनीतिक ताकतों को खा रही है. राजनीतिक कार्यकर्ता अक्सर भाजपा के बढ़ते कद के लिए केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति को ही मानते हैं. कुछ हद तक वे संप्रदाय के नाम पर ध्रुवीकरण करने की रणनीति अपनाते भी हैं. हालिया कुछ सांप्रदायिक तनावों की घटना और कुछ रैलियां हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा की भी गईं और सांप्रदायिक कार्ड खेला भी जा रहा है. लेकिन भाजपा के तेज़ी से बढ़ने और चुनाव परिणामों के लिए केवल इस कारण को ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता. दरअसल, 2011 में वामपंथी चुनाव हार गए जो लोग विपक्षी मंच की खोज में लगे थे उन्होंने भाजपा का दामन थामना शुरू कर दिया.

भाजपा की सबसे कमजोर कड़ी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ ज़रूर रहा है लेकिन पार्टी अभी भी ज़मीनी स्तर पर अपने संगठन का निर्माण कर रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह स्थानीय संगठन को मज़बूत करने के लिए कई बार समयसीमा तय कर चुके हैं, लेकिन राज्य के नेताओं को इसमें ख़ासी मुश्किल आ रही है. कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे करीबी रहे मुकुल रॉय के भाजपा में आने के बाद पार्टी का एक धड़ा महसूस करता है कि ज़मीनी स्तर पर संगठन को खड़ा करने में उसे मदद मिलेगी. मुकुल रॉय वही शख़्स हैं जिन्होंने टीएमसी के संगठन को खड़ा किया है लेकिन वहां ममता बनर्जी की एक छवि थी जिसने संगठन को मज़बूत करने में मदद दी. हालांकि, पाला बदलने के बाद मुकुल रॉय नोआपाड़ा विधानसभा चुनाव में अपनी पसंद का उम्मीदवार तक नहीं उतार पाए जबकि नोआपाड़ा मुकुल रॉय का क्षेत्र है. कामयाबी तो दूर की बात है दरअसल अपने ही क्षेत्र में उन्हें अपने पुराने साथियों का साथ नहीं मिला जिसका कयास था.

via Manju Raj Patrika

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