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Wednesday, August 5, 2020

हर मन में बसे हैं प्रभु श्रीराम, आइये जानते हैं कुछ प्रमुख मंदिर को #भारत_मीडिया, #Bharat_Media

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गोदावरी तट पर माता सीता ने की थी साधना
श्री काला राम मंदिर, नासिक

श्री काला राम मंदिर नासिक में एक प्रमुख तीर्थ स्थल है. पेशवा के सरदार रंगराव ओढ़ेकर द्वारा 1782 में निर्मित यह मंदिर अपने स्थापत्य शैली में त्रिंबकेश्वर मंदिर जैसा दिखता है. वास्तुकला में यह नागर शैली का अनूठा नमूना है. यह मंदिर ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्व रखता है. साथ ही, इसकी बनावट आकर्षण का केंद्र है. इसे पूरी तरह से काले पत्थरों से बनाया गया है. इसलिए इसे 'काला राम' मंदिर कहा गया है. यह मंदिर 74 मीटर लंबा व 32 मीटर चौड़ा है. इसका शिखर तांबे का बना है, जिस पर सोना चढ़ा है. मंदिर की चारों दिशाओं में चार दरवाजे हैं. इस मंदिर के कलश तक की ऊंचाई 69 फीट है व कलश 32 टन शुद्ध सोने से निर्मित है. यहां मंदिर में विराजे हनुमान प्रभु श्रीराम के चरणों की ओर देखते हुए प्रतीत होते हैं. इस मंदिर में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां हैं. यहां एक गणपति मंदिर, हनुमान मंदिर और आस-पास के क्षेत्र में एक विट्ठल मंदिर स्थित है. मंदिर परिसर में सीता गुफा है. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, माता सीता ने यहां बैठकर साधना की थी. मंदिर के नजदीक से गोदावरी नदी बहती है, जहां प्रसिद्ध रामकुंड है. मंदिर की भव्य छटा देखते ही बनती है.

कला और भव्यता का बेजोड़ नमूना
कनक भवन, अयोध्या

अयोध्या स्थित यह मंदिर अपनी कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि माता ने प्रभु श्री राम और देवी सीता को यह भवन उपहार स्वरूप दिया था तथा यह उनका व्यक्तिगत महल था. पहले राजा विक्रमादित्य एवं बाद में वृषभानु कुंवरि ने इसका जीर्णोद्धार कराया था. मुख्य गर्भगृह में श्री राम और माता सीता की प्रतिमा स्थापित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कनक भवन में भगवान राम के अलावा किसी अन्य पुरुष को आने की आज्ञा नहीं थी. इसी मान्यता के आधार पर कनक भवन के गर्भगृह में भगवान राम और माता सीता के अलावा किसी अन्य देवता का विग्रह स्थापित नहीं किया गया है. समय के साथ यह भवन नष्ट हो गया था. वर्तमान के कनक भवन का निर्माण ओरछा के राजा सवाई महेन्द्र प्रताप सिंह की पत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि की देखरेख में हुआ था. 1891 में प्राचीन प्रतिमाओं की पुन: स्थापना की गयी और भगवान राम और माता सीता के दो नये विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा भी करवायी गयी. भक्तजन जब कनक भवन में दर्शनार्थ आते हैं, तो राम-सीता युगल के दर्शन कर कृतार्थ हो जाते हैं. वे कनक भवन के ऊपर बने गुप्त शयनकुंज का भी दर्शन करने की इच्छा करते हैं, परंतु यह शयनालय सबको नहीं दिखाया जाता. किन्हीं कारणों से अब यह आम जनता के दर्शनों के लिए बंद कर दिया गया है.

'दक्षिण की अयोध्या' है भद्राचलम
श्रीसीतारामचंद्र स्वामी मंदिर, भद्राचलम (तेलंगाना)

तेलंगाना के खम्मम जिले में स्थित भद्राचलम को मंदिरों की नगरी कहा जाता है. यहां कई मंदिर हैं, लेकिन श्री सीतारामचंद्र स्वामी मंदिर सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है, जिसकी वजह से इस शहर को 'दक्षिण की अयोध्या' भी कहा जाता है. श्रीराम और सीता को समर्पित मंदिर भद्राचलम शहर में है और पर्णशाला गांव से 35 किमी दूर है, जहां भगवान राम ने अपने वनवास के कुछ समय बिताये थे. कथाओं के मुताबिक, राम जब लंका से सीता को लाने के लिए गये थे, तब यहीं गोदावरी नदी को पार करके गये थे. यह मंदिर गोदावरी नदी के किनारे ठीक उसी जगह पर स्थित है, जहां से राम ने नदी को पार किया था. मंदिर से जुड़ी एक कथा राम के अनन्य भक्त कबीर की है, जो भगवान राम के अनन्य भक्त थे. उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गयी, इस कारण मंदिर में रखी मूर्तियां रहस्यमय ढंग से लापता हो गयीं. हालांकि, जब कबीर ने मंदिर में प्रवेश किया, तब मूर्तियां फिर से निकल आयीं. ऐसे मिथकों और किवदंतियों ने इसे भक्तों के लिए लोकप्रिय धार्मिक स्थल बना दिया है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहां वनवास के दौरान माता सीता का रावण ने अपहरण किया था. यहां आनेवाले श्रद्धालु पर्णशाला में देवी सीता के पैरों के निशान आज भी मौजूद हैं. स्वर्ण हिरण बन कर आये मारीछ की तस्वीर और भिक्षाटन के लिए संन्यासी बन कर आये रावण की भी तस्वीरें मौजूद हैं. इन सभी कारणों से भक्तों के लिए यह मनोरम स्थल है. ऐसी मान्यता है कि अपने भक्त भद्र को आशीर्वाद देने के लिए स्वयं भगवान राम स्वर्ग से उतर कर नीचे आये थे. राम ने भद्र को आश्वासन दिया था कि वे इसी जगह पर अपने श्रद्धालुओं के बीच मौजूद रहेंगे. तभी से इस जगह का नाम भद्राचलम पड़ गया.

यहां रामायण काल के पात्र सजीव प्रतीत होते हैं
रघुनाथ मंदिर, जम्मू

भगवान श्री राम के मंदिर का निर्माण 1857 में महाराजा रणवीर सिंह और उनके पिता महाराजा गुलाब सिंह द्वारा करवाया गया था. मंदिर में सात ऐतिहासिक धार्मिक स्थल मौजूद हैं. आंतरिक भाग में सोना जड़ा है, जो मंदिर की तेजस्विता का प्रतीक है. मंदिर में हिंदू धर्म के 33 करोड़ देवी और देवताओं के लिंगम भी बने हैं, जो ऐतिहासिक हैं. भीतर की दीवारों पर तीन तरफ से सोने की परत चढ़ी हुई है. इसके अलावा, मंदिर के चारों ओर कई मंदिर स्थित हैं, जिनका संबंध रामायण काल के देवी-देवताओं से है. इसकी नक्काशी देखते ही बनती है. यह मंदिर बाहर से पांच कलश नजर आते हैं, जो लंबाई में फैले हैं. गर्भ गृह में राम, सीता और लक्ष्मण की विशाल मूर्तियां हैं. इसमें रामायण व महाभारत काल के कई चरित्रों की मूर्तियां विभिन्न कक्षों में हैं. मान्यता है कि महाराज गुलाब सिंह को मंदिर निर्माण की प्रेरणा श्री रामदास वैरागी से मिली थी. इन्होंने ही गुलाब सिंह के राजा बनने की भविष्यवाणी की थी. वैरागी भगवान राम के भक्त थे. रघुनाथ मंदिर पर नवंबर 2002 में आतंकी हमला भी हो चुका है. तब इसे बंद कर दिया गया था. हमले के 11 साल बाद 2013 में फिर से मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोल दिये गये.

राजा राम को दिया जाता है गार्ड ऑफ ऑनर
राजा राम मंदिर, ओरछा, मध्य प्रदेश
 
मध्य प्रदेश में ओरछा छोटा-सा शहर है, जो जिला टीकमगढ़ के अंतर्गत है. इसी शहर में स्थित राजा राम मंदिर भारत का एकमात्र मंदिर है, जहां राम को भगवान के रूप में नहीं, बल्कि राजा के रूप में पूजा जाता है. इस मंदिर का निर्माण एक भव्य किले के रूप में किया गया है, जिसमें पुलिसकर्मी मंदिर के रक्षक के रूप में सेवा करते हैं. इस मंदिर में विराजे राम को हर दिन पुलिस द्वारा पांचों पहर गार्ड ऑफ ऑनर और शस्त्रों की सलामी दी जाती है. इन पांच पहर में सूर्योदय व सूर्यास्त के समय भी शस्त्रों की सलामी दी जाती है. यह परंपरा लगभग 400 सालों से चली आ रही है. राम को समर्पित यह मंदिर बेहद भव्य है. यह मंदिर देखने में एकदम महल जैसा प्रतीत होता है. इसकी वास्तुकला में बुंदेला स्थापत्य का बेजोड़ नमूना देखा जा सकता है. राजा राम के ओरछा में विराजने की एक प्राचीन कथा आज भी प्रचलित है. महाराजा मधुकरशाह ने पत्नी गणेशकुंवरी से वृंदावन साथ चलने के लिए कहा, लेकिन महारानी तो भगवान राम की भक्ति में लीन थीं. इसलिए उन्होंने जाने से मना कर दिया था. महाराजा ने महारानी को तैश में आकर बोल दिया कि इतने रामभक्त हो, तो अपने राम को ओरछा ले आओ. तब रानी अयोध्या गयीं और वहां सरयू तट पर साधना शुरू कर दी. वहां संत तुलसीदास से आशीर्वाद पाकर रानी की तपस्या और कठोर हो गयी. कई माह बाद भी जब रामजी के दर्शन नहीं हुए, तो रानी नदी में कूद गयीं. नदी में रामजी के दर्शन हुए, तभी रानी ने रामजी को ओरछा चलने के लिए निवेदन किया. प्रभु राम ने शर्त रखी कि ओरछा तो चलेंगे, लेकिन जब वहां उनकी सत्ता और राजशाही होगी. तभी से ओरछा में राम राजा के रूप में विद्यमान हैं. ऐसी मान्यता है कि मंदिर में भगवान राम की मूर्ति को पहले चतुर्भुज मंदिर में रखा जाना था. लेकिन एक बार उस जगह पर रखने के बाद कोई भी इसे वहां से स्थानांतरित करने में सक्षम नहीं था. इस मंदिर की जीवंत दीवारें और संगमरमर का आंगन इस मंदिर को अधिक भव्य बनाते हैं.

सीता का 'आश्रय स्थल'
श्री राम तीर्थ मंदिर, अमृतसर

श्री राम तीर्थ मंदिर ऋषि वाल्मीकि का प्राचीन आश्रम माना जाता है. यह राम मंदिर अमृतसर से 11 किमी दूर स्थित है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, लंका फतह कर लौटने के बाद जब राम ने सीता का परित्याग कर दिया था, तब ऋषि वाल्मीकि ने उन्हें इस आश्रम में आश्रय दिया था. यह वही स्थल है, जहां माता सीता ने जुड़वां बच्चों लव और कुश को जन्म दिया था. जब रामजी ने अश्वमेध यज्ञ के लिए घोड़ा छोड़ा, तब इसी स्थान पर लव-कुश ने उस घोड़े को पकड़ा था और रामजी से युद्ध भी किया था, जिसमें प्रभु राम की सेना पराजित हुई थी. यहीं, 24 हजार छंदों वाली रामायण का पूरा महाकाव्य वाल्मीकि द्वारा इसी आश्रम में रचा गया था. इस स्थल को सीता का 'आश्रय स्थल' भी कहा जाता है. इस तरह की महत्वपूर्ण घटनाओं की एक शृंखला श्रीराम तीर्थ मंदिर को भारत के सबसे पवित्र राम मंदिरों में से एक बनाती हैं. रामायण काल के इस मंदिर परिसर में और भी कई मंदिर हैं. माना जाता है कि यहां के प्रचीन तालाब की खुदाई भगवान हनुमान ने की थी. ऋषि वाल्मीकि की झोपड़ी और सीढ़ी वाला कुआं (जिसमें माता सीता स्नान करती थीं) को परिसर के अंदर संरक्षित है. इस पुण्य स्थान पर नि:संतान महिलाएं स्नान कर संतान की मनोकामना करती हैं.

यहां राम की मूर्ति खुद आ पहुंची थी
त्रिप्रायर रामा मंदिर, त्रिशूर (केरल)

दक्षिण भारत में त्रिप्रायर नदी के किनारे दक्षिण-पश्चिमी शहर त्रिप्रायर में श्रीराम का यह भव्य मंदिर स्थित है. यह मंदिर केरल में त्रिशूर शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर है. यहां की मूर्ति के संबंध में प्रसिद्ध किंवदंतियां हैं. कहा जाता है कि यहां स्थापित मूर्ति इस स्थान के संरक्षक को समुद्र तट पर मिली थी. पुराणों के अनुसार, मान्यता है कि भगवान विष्णु के सातवें अवतार राम की मूर्ति लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की मूर्तियों के साथ त्रिप्रायर के समुद्र तट अपने आप आ पहुंची थीं. यहां से लाकर पूरे विधि-विधान से मूर्ति को प्रतिष्ठापित किया गया था. इस मंदिर में मूर्ति का रूप बहुत ही अलग है, जिसमें चतुर्भुजधारी भगवान विष्णु को राम के रूप में दिखाया गया है. ऐसी भी मान्यता है कि ब्रह्मा और शिव के अंश इस मूर्ति में शामिल हैं, इसलिए इनकी पूजा त्रिमूर्ति के रूप में की जाती है. मंदिर के बाहरी आंगन में भगवान श्री अय्यप्पा का मंदिर बना है. यह मंदिर अरट्टूपुझा पूरम उत्सव के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर के परिसर में एक गर्भ गृह के साथ-साथ एक नमस्कार मंडपम भी है, जहां रामायण कालीन चित्र बने हैं. यहां पर नवग्रहों को दर्शाती हुई लकड़ी की नक्काशी और प्राचीन भित्ति चित्र के भी साक्ष्य हैं. इस मंदिर के प्रांगण में पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन किया जाता है. कोट्टू एक प्रकार का स्थानीय नाट्य कला है, जिसका नियमित प्रदर्शन किया जाता है. एकादसी महोत्सव इस मंदिर में उत्सव और उल्लास के साथ मनाया जाता था.

‘सीता एल्या’ का है बहुत महत्व
श्रीलंका: अशोक वाटिका मंदिर

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार रामायण काल को पांच हजार साल से ज्यादा साल हो गये, बावजूद इसके श्रीलंका में रामायण काल के ऐतिहासिक अवशेष आज पूरी दुनिया में चर्चा के केंद्र में हैं. भारत सहित पूरे विश्व से पर्यटक यहां पहुंचते हैं. श्रीलंका के नुवराएलिया स्थिति अशोक वाटिका भी ऐसा ही स्थान है, जो आश्चर्य में डाल देता है. रावण जब माता सीता का अपहरण कर ले गया था, तो माता का जिस अशोक वाटिका में वास था, वहां पर राम-सीता का भव्य मंदिर है. श्रद्वालु अपना सिर झुकाकर मन्नत मांगने पहुंचते हैं. श्रीलंका में नुवराएलिया स्थित वह जगह आज ‘हकगाला बोटैनिकल गार्डन’ के नाम से मशहूर है. जिस जगह सीता माता को रखा गया था, उसे ‘सीता एल्या’ कहा जाता है. यह अब श्रीलंका का प्रसिद्ध हिल स्टेशन भी है.

यहां भी बन रहा है राम मंदिर
थाईलैंड: भव्य राम मंदिर की तैयारी

भारत के अयोध्या

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